बीकानेर शहर का इतिहास

 

बीकानेर – राजस्थान के पूर्व उत्तरी दिशा मे बसा एक छोटा सा शहर है| बीकानेर यह शहर अपने आप में मदमस्त शहर है यहाँ के लोग काफी मस्तमोले , मिलनसार और बड़े प्रेम से रहते है चाहे वह किसी जाति या धर्म का हो । बीकानेर शहर की नींव सन 1488 ई. में राव जोधा के पांचवे पुत्र राव बीका ने वैशाख शुक्ल तृतीया को रखी थी जिसे अक्षय तृतीया के रूप मे बीकानेर दिवस मनाया जाता है इस दिन परंपरागत रूप से गेंहू और बाजरे का खीचड़ा ठंडी इमली बनाई जाती है और पूरे दिन यहाँ पतंगबाजी की जाती है ।

बीकानेर शहर को छोटीकाशी के नाम से भी जाना जाता है । काबो वाली देवी के रूप मे विश्वविख्यात “करणी माता मंदिर” व कपिल मुनि की तपोभूमि “कोलायत मंदिर” और सरोवर भी यहाँ स्थित है इसके अलावा यहा का जूनागढ किला भी आपको देखने को मिल जाएगा जिसमे बड़े बड़े द्वार राजा महाराजा के कमरे, सभास्थल शयनकक्ष, बड़े बरामदे, खुला आंगन और यहाँ की दीवारों और छतो में की गई उस्ता कला अपनी और आकर्षित करती है किले के चारो और एक दीवार बनाई गई थी उस दीवार के परकोटे के अंदर पूरा बीकानेर शहर बसा हुआ था इस दीवार में पांच गेट हुआ करते थे जिसके आज नाम कोटेगेट, जस्सूसर गेट, नत्थूसर गेट, सीतला गेट ,गोगागेट नाम है आज के समय में यह पूरी दीवार टूट चुकी है और शहर की आबादी आगे तक फैल गयी है

मंदिरो की बात की जाए तो सबसे प्राचीन मंदिर ” जैन भाण्डाशाह ” का है इस मंदिर मे बड़े बड़े स्तंभों पर की गई नक्काशी और दीवारों और छातो पर की गई पेंटिंग कला इसकी शोभा को और ज्यादा बढ़ाती है ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की नींव में 4000 किलो घी डाला गया था। इसी के पास बना नगर सेठ लक्ष्मीनाथ मंदिर भी पर्यटकों का दार्शनिक स्थल है यहाँ के लोगो मे इस मंदिर के प्रति काफी श्रद्धा और लगाव है काफी संख्या मे लोग रोजाना यहाँ दर्शन के लिए आते है ।

बीकानेर शहर के बीच पुराना बाजार बना हुआ है जिसे बड़ा बाजार कहा जाता है जहाँ जरूरत की सारी चीज़े मिल जाती है । इसके अलावा यहां की हवेलियां भी काफी प्रसिद्ध है और बीकानेर को 1001 हवेली का शहर भी कहा जाता है सबसे प्रसिद्ध हवेली में रामपुरिया हवेली का नाम सबसे ऊपर आता है यह शहर के बीच बनी हुई है इसके ऊपर की गई कारीगरी और इसकी सुंदरता पर्यटको को अपनी और आकर्षित करती है यह हवेलिया देश विदेश में अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती है इसी कारण यहाँ विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है ।

खान पान की बात करे तो यहाँ आपको हर तरह का स्वाद खाने को मिल जाएगा यहाँ की भुजिया ,पापड़ ,रसगुल्ला जो पूरे विश्व मे सुप्रसिद्ध है भुजिया की उत्पत्ति सर्वप्रथम बीकानेर से ही हुई है हल्दीराम जो आज का नामचीन खाने का ब्रांड है स्वयं हल्दीराम जी ने ही सबसे पहले भुजिया का निर्माण किया था बीकानेर के भुजिया की खास बात यह भी है कि यहाँ का बना भुजिया का स्वाद कही और बने भुजिया से बहुत अलग होगा यहाँ के हवा और पानी मे ही वो स्वाद है जो आज पूरे देश और विदेश में अपने नाम और स्वाद की छाप छोड़ता है ।

इसके अलावा जो यहाँ की पारंपरिक सब्जियां है जिसे सूखा मेवा बोला जाता है उनमें सांगरी की सब्जी, केर की सब्जी, ग्वारफली की सब्जी, बड़ी की सब्जी और इसके साथ कुमटी, कैर, गुंदा, मेथी, काचरी, सांगरी, चापटीया,आदि को साथ मिलाकर इनकी सब्जी बनाई जाती है जिसे बाजरे, गेहू , मिस्सी की रोटी के साथ खाया जाता है । बीकानेर में घूमने के लिए जो पर्यटन स्थल है उनकी जानकारी हम आने वाले ब्लॉग में देते रहेंगे ।

 

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2 replies on “बीकानेर शहर का इतिहास”

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